Saturday, June 19, 2010

कुछ लिखना हे पर लिख न पाऊ

कुछ लिखना हे पर लिख न पाऊ
कुछ कहेना हे पर कहे न पाऊ
जाने कहा गई वह बातें,वह यादें, वह मुलाकातें
अब तो निकलती भी नहीं इस दिल से वह फरियादें
तुमसे मिलना चाहू पर,
तुम्हारे पास आ न पाऊ
तुमको पास बुलाना चाहू,
पर इस मन को न समझा पाऊ
अधूरी रहे गयी यह कविता,
पूरा इसे कर न पाऊ
कुछ लिखना हे पर लिख न पाऊ
कुछ कहेना हे पर कहे न पाऊ

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